भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—जो लोग तृष्णा से भरपूर रहते हैं, जिनका मन कभी संतुष्ट नहीं होता, जो कपट, घमंड और अभिमान से युक्त होते हैं, वे मोह में पड़कर मिथ्या धारणाएँ पालते हैं और अपवित्र व्रतों के साथ कर्म करते हैं। वे अनगिनत चिंताओं में डूबे रहते हैं, जो मृत्यु तक पीछा नहीं छोड़तीं। उनकी आसक्ति केवल भोगों में होती है और वे यही मानते हैं कि यही सब कुछ है। इनकी आशाएँ सैकड़ों बंधनों में जकड़ी होती हैं, वे काम और क्रोध के वश में होकर अन्यायपूर्ण तरीकों से धन एकत्र करने का प्रयास करते हैं, केवल भोग के लिए। वे सोचते हैं—"आज मैंने यह प्राप्त किया, कल वह प्राप्त करूँगा; यह मेरा है, और आगे भी यह धन मेरा ही रहेगा।" वे कहते हैं—"उस शत्रु को मैंने मार दिया, अब औरों को भी मारूँगा; मैं ही स्वामी हूँ, मैं ही भोगी हूँ, मैं ही सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ।" वे यह भी मानते हैं—"मैं धनवान हूँ, कुलीन हूँ, मुझ जैसा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, और आनंद मनाऊँगा।" इस प्रकार अज्ञान से मोहित, अनेक प्रकार की कल्पनाओं में उलझे, मोह के जाल में फँसे, वे विषयों के भोग में आसक्त रहकर अपवित्र नरकों में गिरते हैं। इनकी बुद्धि अनेक विरोधाभासी विचारों में उलझी रहती है, मोह के जाल में फँसी होती है, और विषयों के भोग में आसक्ति के कारण वे अपवित्र नरकों में ही गिरते हैं। वे अपने को बड़ा मानते हैं, हठी, घमंडी और धन के मद से चूर रहते हैं। वे यज्ञ भी केवल नाम के लिए, दिखावे और शास्त्र-विरुद्ध करते हैं। ऐसे लोग अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोध का सहारा लेते हैं, अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं। भगवान कहते हैं—ऐसे द्वेषी, क्रूर, मानवों में सबसे अधम लोगों को मैं बार-बार दैत्य योनि में डालता हूँ। ये दैत्य योनि में जन्म लेते हैं, बार-बार मोहित होते हैं, और मुझ तक पहुँच नहीं पाते; वे सबसे नीच गति को प्राप्त होते हैं। भगवान आगे समझाते हैं—"काम, क्रोध और लोभ—ये तीन नरक के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करते हैं। अतः, मनुष्य को चाहिए कि इन तीनों को त्याग दे।" हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य इन अंधकार के तीनों द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण के लिए कार्य करता है और परम गति प्राप्त करता है। लेकिन जो मनुष्य शास्त्र के आदेशों को त्याग कर अपनी इच्छा के अनुसार चलता है, वह न तो सिद्धि, न सुख, न ही परम गति प्राप्त करता है। इसलिए, क्या करना है और क्या नहीं करना है, इसका निर्णय शास्त्र ही है। शास्त्र के आदेश को जानकर ही इस लोक में कर्म करना चाहिए। यहाँ अर्जुन प्रश्न करते हैं—"हे कृष्ण! जो लोग श्रद्धा से युक्त होकर शास्त्र के आदेशों की उपेक्षा करते हुए पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? क्या वह सत्त्वगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी है?" भगवान उत्तर देते हैं—"श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, जो देहधारियों की प्रकृति से उत्पन्न होती है: सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। सुनो, मैं विस्तार से बताता हूँ।" प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसकी प्रकृति के अनुरूप होती है। जैसा जिसकी श्रद्धा है, वही उसका स्वरूप बन जाता है। सात्त्विक लोग देवताओं की पूजा करते हैं, राजसिक लोग यक्षों और राक्षसों की, और तामसिक लोग भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं। जो लोग शास्त्र का पालन किए बिना कठोर तप करते हैं, जो कपट, अहंकार, वासना और आसक्ति से युक्त होते हैं, वे अपने शरीर के पंचमहाभूतों को भी कष्ट देते हैं और उसमें स्थित मुझ परमात्मा को भी। जान लो, उनकी प्रवृत्ति आसुरी है। भोजन भी तीन प्रकार का होता है, वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी। अब मैं उनके भेद बताता हूँ। जो भोजन आयु, सत्त्व, बल, स्वास्थ्य, सुख और संतोष बढ़ाता है, जो स्वादिष्ट, स्निग्ध, स्थिर और हृदय को प्रिय होता है, वह सात्त्विकों को प्रिय है। जो भोजन कटु, अम्ल, लवणयुक्त, अत्यधिक गर्म, तीखा, शुष्क और जलानेवाला होता है, वह राजसिकों को प्रिय है, लेकिन वह दुख, शोक और रोग उत्पन्न करता है। जो भोजन बासी, स्वादहीन, सड़ा-गला, बचा हुआ और अशुद्ध होता है, वह तामसिकों को प्रिय होता है। जो यज्ञ शास्त्र के अनुसार, फल की इच्छा किए बिना, 'यह कर्तव्य है'—इस भावना से किया जाता है, वह सात्त्विक है। लेकिन जो यज्ञ फल की इच्छा से या दिखावे के लिए किया जाता है, वह राजसिक है। जो यज्ञ शास्त्र-विरुद्ध, बिना मंत्र, बिना दक्षिणा, बिना श्रद्धा और बिना भोजन वितरण के किया जाता है, वह तामसिक है। देवताओं, द्विजों, गुरुजनों और विद्वानों की पूजा, शुद्धता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा—ये शरीर का तप कहलाते हैं। वाणी का तप है—ऐसी वाणी जो किसी को उद्विग्न न करे, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा नियमित स्वाध्याय और जप किया जाए। मन का तप है—मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-नियंत्रण और स्वभाव की शुद्धता। इन तीनों प्रकार के तपों को जो श्रद्धा से, फल की इच्छा के बिना, दृढ़ता से करता है, वह सात्त्विक तप कहलाता है। जो तप आदर, प्रतिष्ठा या पूजन के लिए अथवा कपट से किया जाता है, वह राजसिक और चंचल है। जो तप अज्ञानवश, स्वयं को या दूसरों को कष्ट पहुँचाने के लिए किया जाता है, वह तामसिक है। जो दान 'देना चाहिए'—इस भाव से, योग्य स्थान, योग्य समय और योग्य पात्र को, बिना किसी प्रतिदान की इच्छा के दिया जाता है, वह सात्त्विक है। जो दान प्रत्युपकार या फल की इच्छा से, या अनिच्छा से दिया जाता है, वह राजसिक है। जो दान अनुचित स्थान, अनुचित समय, अयोग्य व्यक्ति को, बिना सम्मान या तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है, वह तामसिक है। 'ॐ तत् सत्'—ये ब्रह्म का त्रैविध्य नाम है, जिसके द्वारा प्राचीन काल में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ स्थापित हुए। अतः, जो ब्रह्म को जानते हैं, वे शास्त्रानुसार यज्ञ, दान और तप का आरंभ 'ॐ' कहकर करते हैं। 'तत्' का उच्चारण कर, फल की इच्छा का त्याग करके, वे विविध यज्ञ, तप और दान करते हैं—मुक्ति की कामना से। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म, श्रद्धा, तप, यज्ञ और दान के भेद, उनके गुणों के अनुसार विस्तार से समझाए, और यह भी बताया कि शास्त्र ही कर्तव्य-अकर्तव्य का अंतिम प्रमाण है।