अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप का दर्शन करके अत्यंत विस्मित और भावविभोर हो उठे। वे बोले, “हे महात्मा! आप तो स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से भी महान हैं, आप सबका आदि कारण हैं। आप अनंत, देवों के स्वामी और समस्त जगत के आश्रय हैं। आप ही अविनाशी हैं—जो अस्तित्व में है, जो नहीं है और जो इन दोनों से परे भी है। आप ही आदि देव, सनातन पुरुष और समस्त ब्रह्मांड के परम आश्रय हैं। आप ज्ञाता भी हैं, ज्ञेय भी हैं और परम धाम भी। हे अनंत रूप वाले! आप ही से यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और पितामह भी हैं। आपको बार-बार, सहस्त्रों बार नमस्कार! आगे से, पीछे से, चारों ओर से आपको बार-बार प्रणाम! आपकी शक्ति अनंत है, आपका पराक्रम माप से परे है। आप सर्वत्र हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं। हे कृष्ण! मित्र समझकर मैंने जो भी अपमानजनक या असावधानीवश, स्नेहवश, अथवा हंसी में, विश्राम करते, बैठते, खाते या अकेले अथवा अन्य लोगों के सामने आपको जो कुछ भी कहा या किया, उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। आप अच्युत हैं, आप अनंत हैं। आप जगत के पिता हैं—चर-अचर सब आपके ही संतान हैं। आप पूज्य हैं, आप गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं, फिर आपसे बड़ा कौन हो सकता है? इसलिए मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ, दंडवत करता हूँ और आपकी कृपा चाहता हूँ। जैसे पिता पुत्र के अपराध को सह लेता है, मित्र मित्र को क्षमा करता है, या प्रिय प्रियतम को क्षमा कर देता है, वैसे ही आप भी मुझे क्षमा करें। हे देव! मैंने जो अद्भुत रूप देखा है, उससे मैं आनंदित हूँ, परंतु मेरा मन भय से व्याकुल भी है। कृपा करके मुझे अपना वही सौम्य रूप दिखाइए, हे देवों के स्वामी, हे जगत के आश्रय! मैं आपको फिर से उसी मुकुटधारी, गदा और चक्रधारी चार भुजाओं वाले रूप में देखना चाहता हूँ। हे सहस्त्रबाहु! मुझे वही स्वरूप दिखाईए।” तब भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे अर्जुन! मेरी कृपा से तुमने यह परम दिव्य, विराट रूप देखा है, जो मेरे योगबल से प्रकट हुआ—यह तेजस्वी, अनंत, आदि रूप तुमसे पहले किसी ने नहीं देखा। वेदों के अध्ययन, यज्ञ, दान, अनुष्ठान या कठोर तपस्या से भी मनुष्यों द्वारा इस रूप का दर्शन नहीं हो सकता, केवल तुमने ही इसे देखा है। अब भय या भ्रम मत करो। तुम्हारा भय मिटाकर, तुम्हें प्रसन्नचित्त करने के लिए, मैं पुनः अपना वही सौम्य रूप दिखाता हूँ।” संजय ने कहा—इतना कहकर भगवान वासुदेव ने अर्जुन के समक्ष अपना वही सुंदर, मानव जैसा रूप प्रकट किया और डरे हुए अर्जुन को सांत्वना दी। अर्जुन ने कहा, “हे जनार्दन! आपके इस सौम्य मानव रूप को देखकर अब मेरा मन शांत हो गया है और मैं स्वाभाविक अवस्था में आ गया हूँ।” भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे अर्जुन! मेरा यह रूप देखना अत्यंत दुर्लभ है। स्वयं देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए लालायित रहते हैं। वेद, तप, दान, यज्ञ आदि से भी इस रूप का साक्षात्कार नहीं होता, जैसा तुमने किया है। किंतु, अनन्य भक्ति से ही मुझे इस रूप में जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता है। जो मेरे लिए कार्य करता है, मुझे ही सर्वश्रेष्ठ मानता है, मुझसे अनुरक्त है, सब प्राणियों से द्वेष-रहित और आसक्तिरहित है—वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है, हे पाण्डव।” इसके पश्चात अर्जुन ने प्रश्न किया, “हे कृष्ण! जो भक्त निरंतर आपकी उपासना करते हैं और जो अविनाशी, अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करते हैं, उनमें से योग में श्रेष्ठ कौन है?” भगवान ने उत्तर दिया, “जो मन को मुझमें स्थिर कर, अटूट श्रद्धा और भक्ति से मेरी आराधना करते हैं, वे मेरे अनुसार योग में श्रेष्ठ माने जाते हैं। किंतु जो अव्यक्त, अविनाशी, सर्वव्यापी, अगोचर, अचल, नित्य की उपासना करते हैं—इन्द्रियों को संयमित रखकर, सर्वत्र समभाव से, सबके कल्याण में रत रहते हैं—वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं। परंतु अव्यक्त का ध्यान करना देहधारी के लिए कठिन है। जो सब कर्म मुझे समर्पित कर, मुझे ही परम मानकर, अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हैं, उनके लिए मैं स्वयं जन्म-मरण के सागर से पार लगने वाला बन जाता हूँ। अतः मन को मुझमें ही लगाओ, बुद्धि को मुझमें ही रखो—तब निश्चित ही तुम मुझमें ही निवास करोगे। यदि यह स्थिरता संभव न हो, तो बार-बार अभ्यास द्वारा मुझे पाने का प्रयत्न करो। यदि अभ्यास भी कठिन हो, तो मेरे लिए कर्म करो; मेरे लिए कर्म करते-करते भी सिद्धि मिल जाएगी। यदि यह भी न कर सको, तो योग का आश्रय लेकर, सब कर्मों के फल का त्याग करो—फल-त्याग के बाद शांति तुरंत प्राप्त होती है। ज्ञान अभ्यास से श्रेष्ठ है, ध्यान ज्ञान से श्रेष्ठ है, और फल-त्याग ध्यान से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग के बाद तुरंत शांति मिलती है। जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में सम है, क्षमाशील है, संतुष्ट और सदा आत्म-नियंत्रित है, दृढ़ निश्चयी है, मन-बुद्धि मुझमें अर्पित है—वह भक्त मुझको प्रिय है। जिससे संसार विचलित नहीं होता और जो स्वयं संसार से विचलित नहीं होता, जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और चिंता से मुक्त है—वह भी मुझे प्रिय है। जो कुछ भी अपेक्षा नहीं करता, शुद्ध है, कुशल है, पक्षपात-रहित है, क्लेश से मुक्त है, और जिसने सब कर्मों का परित्याग कर दिया है—वह भक्त भी मुझे प्रिय है। जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न इच्छा करता है, जिसने शुभ-अशुभ का त्याग कर दिया है, और जो भक्ति से पूर्ण है—वह मुझे प्रिय है। जो शत्रु-मित्र, मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि में समभाव रखता है, आसक्ति से रहित है, प्रशंसा-निंदा में समान है, मौन है, जो कुछ भी प्राप्त होता है उसमें संतुष्ट है, स्थिर-बुद्धि है, और मुझमें अनुरक्त है—वह भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है। जो इस अमृतमय धर्म का श्रद्धा से पालन करते हैं, मुझे ही परम मानते हैं, वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं।” इतना कहने के बाद अर्जुन ने पुनः प्रश्न किया, “हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेय के विषय में जानना चाहता हूँ।