भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—इंद्रियाँ श्रेष्ठ मानी जाती हैं, लेकिन उनसे भी श्रेष्ठ मन है। मन से भी श्रेष्ठ बुद्धि है, और बुद्धि से परे जो है, वही वास्तव में सबसे श्रेष्ठ है। जब मनुष्य यह जान लेता है कि बुद्धि से भी परे कोई तत्व है, तब उसे अपने आपको उसी आत्मा में स्थिर करना चाहिए और कामना रूपी कठिन शत्रु का नाश करना चाहिए। इसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—हे अर्जुन! मैंने यह अविनाशी योग सबसे पहले विवस्वान को बताया था, विवस्वान ने इसे मनु को सुनाया, और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को बताया। इस प्रकार यह योग परंपरा से राजर्षियों द्वारा जाना गया, किंतु समय के साथ यह योग यहाँ लुप्त हो गया। अब वही प्राचीन योग मैं तुम्हें बता रहा हूँ, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो—यह वास्तव में परम रहस्य है। यह सुनकर अर्जुन ने प्रश्न किया—हे केशव! आपका जन्म तो अभी हुआ है, जबकि विवस्वान का जन्म बहुत पहले हुआ था। तो मैं कैसे मानूं कि आपने आदि में उसे यह उपदेश दिया? भगवान मुस्कुराकर बोले—हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हो चुके हैं। मुझे वे सब ज्ञात हैं, परंतु तुम्हें नहीं। मैं जन्मरहित, अविनाशी और समस्त प्राणियों का स्वामी होते हुए भी, अपनी प्रकृति को वश में करके, अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ। सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ। जो मेरी दिव्य उत्पत्ति और कर्म को यथार्थ रूप से जानता है, वह शरीर छोड़ने के बाद जन्म नहीं लेता, बल्कि मेरे पास आ जाता है। जो लोग आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें लीन रहते हैं और ज्ञान की तपस्या से शुद्ध हुए हैं, वे मेरी स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं। लोग मुझे जैसे-जैसे भजते हैं, मैं वैसे-वैसे उन्हें स्वीकार करता हूँ। सब लोग हर प्रकार से मेरे ही पथ का अनुसरण करते हैं। मनुष्य यहाँ कर्मों में सिद्धि की इच्छा से देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि कर्म से मिलने वाली सफलता मनुष्यों में शीघ्र मिलती है। गुण और कर्म के अनुसार मैंने चार वर्णों की रचना की है, किंतु जानो कि मैं उनका कर्ता होकर भी अकर्ता और अविनाशी हूँ। कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, न ही मैं कर्मों के फल की इच्छा करता हूँ। जो मुझे इस प्रकार जानता है, वह भी कर्मों से नहीं बंधता। पूर्वकाल में भी मोक्ष की इच्छावाले ज्ञानी जनों ने यह जानकर ही कर्म किए थे, अतः तुम्हें भी पूर्वजों के समान कर्म करना चाहिए। कर्म क्या है और अकर्म क्या है, यह समझना कठिन है; मैं तुम्हें कर्म का रहस्य बताऊँगा, जिसे जानकर तुम पाप से मुक्त हो जाओगे। कर्म, विकर्म और अकर्म—इन तीनों को समझना चाहिए, क्योंकि कर्म का मार्ग अत्यंत गूढ़ है। जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है और सब कर्मों में सिद्ध है। जिसकी सभी प्रवृत्तियाँ कामना और संकल्प से रहित हैं, जिसके कर्म ज्ञानाग्नि से भस्म हो गए हैं, उसे ज्ञानीजन पंडित कहते हैं। जो फल की आसक्ति छोड़कर, सदा संतुष्ट और किसी पर निर्भर नहीं रहता, वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता। जो व्यक्ति अपेक्षा और ममता रहित, मन और आत्मा को वश में कर, केवल शरीर से कर्म करता है, वह पाप से नहीं बंधता। जो संयोग से प्राप्त वस्तु में संतुष्ट, द्वंद्वातीत, ईर्ष्या रहित और सफलता–असफलता में सम रहता है, वह कर्म करता हुआ भी बंधता नहीं। जिसके सब कर्म आसक्ति रहित, मुक्त, ज्ञान में स्थित और यज्ञ के लिए किए गए हैं, उसके सभी कर्म पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं। यज्ञ में ब्रह्म ही आहुति है, ब्रह्म ही हवि है, ब्रह्म ही अग्नि है और ब्रह्म में ही आहुति दी जाती है। जो व्यक्ति कर्म को ब्रह्मभाव में लीन होकर करता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है। कुछ योगी देवताओं की पूजा यज्ञ के रूप में करते हैं, कुछ ब्रह्म में ही यज्ञ रूप से आहुति देते हैं। कुछ इंद्रियों को संयम की अग्नि में समर्पित करते हैं, तो कुछ विषयों को इंद्रियों की अग्नि में अर्पित करते हैं। कुछ ज्ञानीजन सभी इंद्रिय और प्राणों के कर्मों को ज्ञानरूप संयम की अग्नि में समर्पित करते हैं। कुछ लोग द्रव्ययज्ञ, कुछ तपयज्ञ, कुछ योगयज्ञ, और कुछ व्रतों में स्थिर रहकर स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करते हैं। कोई श्वास को नियंत्रित करके प्राणायाम रूप यज्ञ करते हैं, कोई श्वास के प्रवाह को रोकते हैं, और कोई संयमित आहार के द्वारा प्राणों को प्राण में अर्पित करते हैं। ये सब यज्ञ को जानने वाले हैं, जिनके पाप यज्ञ से नष्ट हो जाते हैं। जो यज्ञ के अमृत का पान करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वाले के लिए न तो यह लोक है, न परलोक। इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ ब्रह्म के मुख में विस्तार किए गए हैं, इन्हें सब कर्मजन्य जानो; ऐसा समझकर तुम मुक्त हो जाओगे। हे अर्जुन! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि सभी कर्मों का अंत ज्ञान में होता है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए श्रद्धा, विनम्रता, सेवा और प्रश्न के साथ ज्ञानी जनों के पास जाओ; वे तुम्हें ज्ञान प्रदान करेंगे। जब तुम यह ज्ञान प्राप्त कर लोगे, तब फिर कभी ऐसे मोह में नहीं पड़ोगे; उस ज्ञान से तुम समस्त प्राणियों को अपने में और मुझमें देखोगे। यदि तुम सबसे बड़े पापी भी हो, तो भी ज्ञानरूपी नौका से समस्त पापों से पार हो जाओगे। जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर देती है। इस संसार में ज्ञान से बढ़कर कोई भी शुद्ध करने वाला नहीं है; योग में सिद्ध हुआ मनुष्य, समय आने पर, उसी ज्ञान को अपने भीतर स्वयं अनुभव करता है।