भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—“हे अर्जुन! जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए, राग-द्वेष से मुक्त होकर, विषयों के बीच विचरता है, वह आत्मसंयम से शान्ति को प्राप्त करता है। जब मनुष्य शान्ति को प्राप्त करता है, तब उसके सभी दुःख समाप्त हो जाते हैं और उसका मन शीघ्र ही स्थिर हो जाता है। लेकिन जिसका मन स्थिर नहीं होता, उसके पास न तो ज्ञान होता है, न ध्यान; और ध्यान के बिना शान्ति नहीं मिलती, और जो अशांत है, वह सुख कैसे पाएगा? जब मनुष्य का मन चंचल इन्द्रियों के पीछे चलता है, तो वह उसकी बुद्धि को वैसे ही बहा ले जाता है जैसे जल में तेज़ हवा नाव को बहा ले जाती है। इसलिए, हे महाबाहु अर्जुन! जिसकी सभी इन्द्रियाँ विषयों से पूरी तरह संयमित हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है। जो साधक रात्रि में जागता है, वही सब प्राणियों के लिए रात है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह ज्ञानी के लिए रात्रि के समान है। जिस प्रकार अनेक नदियाँ सदा समुद्र में प्रवेश करती हैं, फिर भी समुद्र स्थिर रहता है, वैसे ही जो व्यक्ति इच्छाओं से विचलित नहीं होता, उसमें कितनी भी इच्छाएँ प्रवेश करें, वह शान्त रहता है। लेकिन जो इच्छाओं की पूर्ति चाहता है, उसे शान्ति नहीं मिलती। जो व्यक्ति सब इच्छाओं का त्याग कर देता है, आसक्ति और अहंकार से रहित होकर चलता है, वही सच्ची शान्ति को प्राप्त करता है। हे पार्थ! यही ब्रह्मस्थिति है—इसको प्राप्त कर मनुष्य मोहित नहीं होता, और इस स्थिति में जीवन के अंत में स्थित रहकर ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त करता है।” यह सुनकर अर्जुन ने प्रश्न किया—“हे जनार्दन! यदि आप ज्ञान को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे इस भयानक युद्ध के लिए क्यों प्रेरित करते हैं? आपके वचनों से मेरा मन जैसे विरोधाभास में पड़ गया है। कृपा कर मुझे स्पष्ट बताइए कि मेरे लिए सर्वोत्तम क्या है?” भगवान बोले—“हे निष्पाप अर्जुन! इस संसार में मैंने पहले भी दो मार्ग बताए हैं—सांख्य योगियों के लिए ज्ञान का मार्ग और कर्मयोगियों के लिए कर्म का मार्ग। केवल कर्म का त्याग करने से कोई निष्क्रियता को प्राप्त नहीं होता, न ही केवल संन्यास से सिद्धि मिलती है। वास्तव में, कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; प्रकृति से उत्पन्न गुणों के कारण सबको कर्म करना ही पड़ता है। जो व्यक्ति इन्द्रियों को तो वश में करता है, परन्तु मन से विषयों का चिन्तन करता है, वह मिथ्याचारी कहलाता है। लेकिन जो मन से इन्द्रियों को वश में रखकर, आसक्ति रहित होकर, अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही श्रेष्ठ है। इसलिए, अपने कर्तव्य का पालन करो, क्योंकि कर्म निष्क्रियता से श्रेष्ठ है; बिना कर्म किए तो शरीर की भी रक्षा संभव नहीं। इस संसार में यज्ञ के लिए किए गए कर्म को छोड़कर अन्य सभी कर्म बंधन में डालते हैं। अतः हे कुन्तीपुत्र! आसक्ति रहित होकर यज्ञ के लिए कर्म करो। सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा ने यज्ञ सहित प्रजा की रचना करके कहा था—‘इसी यज्ञ से तुम वृद्धि को प्राप्त करोगे, यह तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति करेगा।’ यज्ञ से देवताओं की वृद्धि करो, वे देवता भी तुम्हारी वृद्धि करेंगे; इस प्रकार एक-दूसरे को पुष्ट करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे। यज्ञ से पुष्ट देवता तुम्हें इच्छित भोग देंगे। जो व्यक्ति देवताओं द्वारा दिए गए भोगों का यज्ञ में भाग न देकर उपभोग करता है, वह चोर है। यज्ञ के शेष अन्न को खाने वाले पाप से मुक्त होते हैं, लेकिन जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं। सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से होता है, वर्षा यज्ञ से और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है। कर्म वेद से उत्पन्न होता है और वेद अक्षर ब्रह्म से; इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है। जो इस चक्र का पालन नहीं करता, जो केवल इन्द्रिय सुख में लिप्त रहता है, वह व्यर्थ जीवन जीता है, पापमय जीवन जीता है। लेकिन जो आत्मा में ही तृप्त, संतुष्ट और पूर्ण है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। उसके किए या न किए कर्म से कोई प्रयोजन नहीं, वह किसी अन्य प्राणी पर निर्भर नहीं रहता। इसलिए, जो कर्तव्य है, उसे सदा आसक्ति रहित होकर करो, क्योंकि निष्काम कर्म से मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त करता है। जनक आदि राजाओं ने भी कर्म करते हुए सिद्धि पाई थी; और जगत के हित के लिए भी तुम्हें कर्म करना चाहिए। श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग उसका अनुसरण करते हैं; वह जो आदर्श स्थापित करता है, संसार उसका अनुसरण करता है। हे पार्थ! मेरे लिए तीनों लोकों में कोई कर्तव्य नहीं है, न ही मुझे कुछ अप्राप्त प्राप्त करना है, फिर भी मैं कर्म करता हूँ। यदि मैं कर्म न करूँ तो अन्य लोग भी मेरा अनुकरण करेंगे। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये लोक विनष्ट हो जाएँगे, सृष्टि में विक्षोभ हो जाएगा और प्राणी नष्ट हो जाएँगे। अज्ञानी लोग आसक्ति से कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को भी आसक्ति रहित होकर, लोक-कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए। ज्ञानी को चाहिए कि वह अज्ञानी और आसक्त लोगों की बुद्धि को विचलित न करे, बल्कि स्वयं संयमित रहकर, सबको कर्म में प्रवृत्त करे। सभी कर्म प्रकृति के गुणों से ही होते हैं, लेकिन जो अहंकार से मोहित है, वह सोचता है—‘मैं कर्ता हूँ।’ लेकिन जो तत्वज्ञानी है, वह गुणों और कर्मों का भेद जानता है और समझता है कि ‘गुण ही गुणों में प्रवृत्त हैं’, इसलिए वह आसक्त नहीं होता। जिनकी बुद्धि प्रकृति के गुणों से मोहित है, वे कर्मों में आसक्त रहते हैं; ज्ञानी को चाहिए कि वह अज्ञानी और मंदबुद्धि लोगों को विचलित न करे। हे अर्जुन! सभी कर्म मुझे समर्पित कर दो, मन से मेरा स्मरण करते हुए, आसक्ति और ममता से रहित होकर, युद्ध करो। जो लोग श्रद्धा और बिना द्वेष के मेरी इस शिक्षा का पालन करते हैं, वे भी कर्मों से मुक्त हो जाते हैं।