एक समय की बात है, जब ऋषियों और देवताओं ने औषधियों की महान शक्ति का रहस्य खोजा। उन्होंने देखा कि धरती पर उगने वाली हर घास, हर पौधा, दिव्य तेज और रक्षा से भरपूर है। सबसे पहले उन्होंने कुश (दर्भा) का स्मरण किया, जिससे वे वीरता के कार्य करते थे। दर्भा को धारण कर वे निर्भय रहते, और सूर्य के समान चारों दिशाओं में अपनी प्रभा से चमकते थे। फिर उन्होंने जङ्गिडा नामक अद्भुत औषधि की महिमा गाई। जङ्गिडा, जो सबका रक्षक है—चाहे दो पैर वाले हों या चार पैर वाले। जङ्गिडा, जो लोभ, रोग, विष, और शत्रुता को दूर करता है; जो सैकड़ों प्रकार के दोषों को हरता है। यह औषधि ऊर्जा का सार है, और इसकी कृपा से सभी अनिष्ट, विष और अमंगल दूर हो जाते हैं। ऋषि कहते हैं—जङ्गिडा टोना-टोटका और शत्रुता का संहारक है; यह हमें जीवन के कठिन मार्गों से पार लगाता है। इसकी महानता हमें चारों ओर से सुरक्षित रखती है, जैसे देवों ने इसे पृथ्वी पर स्थापित किया। प्राचीन ब्राह्मणों ने इसे 'अंगिरा' के नाम से जाना। न कोई पुरानी औषधि, न कोई नयी, इसकी बराबरी कर सकती; यह सबसे उग्र, सबसे शुभकारी रक्षक है। इंद्र ने इसमें बल और तेज भरा, और उपेन्द्र ने इसे शक्ति दी। यह समस्त रोगों, दुष्ट आत्माओं और विष को हरता है। जङ्गिडा क्षय, पीठदर्द, ज्वर, विष—सभी कष्टों को दूर करता है। ऋषियों ने इंद्र का नाम लेकर जङ्गिडा को दिया, जिसे देवों ने दुर्बलता के विनाश के लिए सर्वोत्तम औषधि बनाया। जङ्गिडा धन का भी रक्षक है, जैसे खजाने की रक्षा होती है। यह शत्रुओं का नाश करता है, बुरी दृष्टि और दुष्ट विचारों को हज़ार नेत्रों से पहचानकर नष्ट करता है। आकाश, पृथ्वी, अंतरिक्ष, वनस्पति, प्राणी—सभी ओर से यह रक्षा करता है। देवों द्वारा बनाई गई सभी औषधियों को जङ्गिडा विषरहित कर देता है। ऋषि आगे कहते हैं—एक दिव्य रत्न है, जो सौ गुना शक्ति से भरपूर है; यह क्षय और दुष्ट आत्माओं को दूर भगाता है। इसके सींगों से यह दानवों को, जड़ों से जादू-टोने को, और मध्य भाग से क्षय को हरता है। यह रत्न सौ वीरों को उत्पन्न करता है, सौ रोगों और अमंगल को दूर करता है, और दानवों को हिला देता है। यह सोने के सींगों वाला बलवान वृषभ है, जिसने सभी अमंगलों को काट दिया है। गंधर्वों, अप्सराओं, और बार-बार लौटने वाले कष्टों को भी यह रत्न सौ गुना शक्ति से दूर करता है। अग्नि से प्राप्त तेज, यश, बल, ओज, और आयु—ये सब हमें प्राप्त हों, ऐसी प्रार्थना ऋषि अग्नि से करते हैं। वे कहते हैं—यह तेज, यह बल, यह ओज मेरे शरीर में स्थापित हो, मैं इसे इंद्रियों, कर्म, सामर्थ्य और शतायु जीवन के लिए ग्रहण करता हूँ। ऋषि भोजन, बल, ओज, सहनशक्ति, विजय, और प्रजापति के लिए प्रार्थना करते हैं। वे ऋतुओं, मासों, वर्षों, और जीवों के स्वामी को अर्घ्य समर्पित करते हैं। वे कहते हैं—गुग्गुल की दिव्य गंध जिसे प्राप्त होती है, उसे न रोग छूता है, न शाप। रोग उससे ऐसे भागते हैं, जैसे हिरण या घोड़े डर कर भागते हैं। वह 'दो सिरों वाला रक्षक' कहलाता है। हिमालय से दिव्य, रक्षक कुंठा औषधि आती है, जो ज्वर और जादू को नष्ट करती है। इसके तीन नाम हैं—नदीज, नदीप्रिय, और नदीमानव। इसकी माता 'जीवती', पिता 'जीवत' कहलाते हैं। यह वनस्पतियों में सर्वोच्च है, जैसे पशुओं में बाघ, वन्य जीवों में सिंह। यह संपूर्ण रोगों, विष, और अनिष्ट को हरती है। कुंठा का जन्म अमरता के स्थान से हुआ—तीन बार शंभुओं, अंगिरसों, आदित्यों, और सर्वदेवों से; यह सोम के साथ खड़ी है। अश्वत्थ वृक्ष, जो तीसरे, असीम स्वर्ग में है, वहीं अमरता का आसन है—वहीं से कुंठा उत्पन्न हुई। स्वर्णमय नौका स्वर्ग में चली, वहीं से कुंठा का जन्म हुआ। हिमालय के शिखर पर, जहां नौका उतरी, वहीं से यह औषधि आई, जो सब रोगों की दवा है। ऋषि कहते हैं—सिर का दर्द, सदा विद्यमान पीड़ा, हायना—इन सब ज्वरों को कुंठा दूर करे। फिर वे प्रार्थना करते हैं—यदि मन या वाणी में कोई रिक्तता रह गई हो, जिसे सरस्वती ने क्रोध से भर दिया हो, तो बृहस्पति और समस्त देवता उसे पूर्ण करें। वे जल से विनती करते हैं—मेरी बुद्धि न छीनो, मेरी तपस्या, दीक्षा, और आयु की रक्षा करो। अश्विनीकुमारों से प्रार्थना है—जिन्होंने प्रकाश दिया, अंधकार दूर किया, वे हमें अन्न दें। अंत में, ऋषि कहते हैं—सर्वोत्तम की कामना करते हुए, स्वर्ग को जानने वाले ऋषियों ने पहले तप और दीक्षा का पालन किया। उसी से राज्य, बल, और ओज उत्पन्न हुआ—देवता वही हमें प्रदान करें। इस प्रकार, ऋषियों ने औषधियों, देवताओं और तपस्या की महिमा का गान किया, और समस्त जीवों के लिए स्वास्थ्य, बल, रक्षा और दीर्घायु की मंगलकामना की।