यह कथा एक ऐसे समय की है जब ऋषि, देवता और मनुष्य अपनी विजय, समृद्धि, तेज, पवित्र ज्ञान, स्वर्ग, यज्ञ, पशुधन, संतति और वीरता को अपना अधिकार मानते थे। वे गर्व से कहते हैं—“विजय हमारी है, प्रस्फुटन हमारा है, समृद्धि हमारी है, हमारा तेज, हमारा पवित्र ज्ञान, हमारा स्वर्ग, हमारा यज्ञ, हमारे पशु, हमारी संतान, हमारे वीर—ये सब हमारे हैं।” इसी आत्मविश्वास और दृढ़ता के साथ वे एक विशेष वंशज, एक पुत्र, को अलग करते हैं—चाहे वह कोई भी हो—और प्रार्थना करते हैं कि वह अथर्वन् के बंधनों को न तोड़े। इसी प्रकार वे बार-बार उच्चारण करते हैं कि वही वंशज अथर्वन् के संतानों, वन के अधिपतियों, वन्य जीवों, ऋतुओं, कालखंडों, महीनों, पक्षों, दिन-रात, संयुक्त दिवस, स्वर्ग और पृथ्वी, इन्द्र और अग्नि, मित्र और वरुण, तथा राजा वरुण के बंधनों को न तोड़े। उनका उद्देश्य है कि यह वंशज इन दिव्य और प्राकृतिक नियमों से जुड़ा रहे, उनका उल्लंघन न करे। फिर वे पुनः गर्व से घोषणा करते हैं—“विजय हमारी है, प्रस्फुटन हमारा है, समृद्धि हमारी है, हमारा तेज, हमारा पवित्र ज्ञान, हमारा स्वर्ग, हमारा यज्ञ, हमारे पशु, हमारी संतान, हमारे वीर—ये सब हमारे हैं।” वे प्रार्थना करते हैं कि सब युद्ध और शत्रुता हमसे दूर हो जाएं। आग्नेय, सोम और पूषन देवता कहते हैं—“तुम धर्म के लोक से कभी नीचे न गिरो।” वे बताते हैं कि हमने स्वर्ग और प्रकाश को प्राप्त किया है, हम सब सूर्य की ज्योति में एकत्र हुए हैं। वे कामना करते हैं कि यज्ञ धन-सम्पत्ति से परिपूर्ण हो, मैं धन प्राप्त करूं, मैं समृद्ध बनूं, और धन मुझमें स्थापित हो। इसके बाद, एक मित्रता की भावना से कोई पुकारता है—“हे मित्र, मैं तुम्हारे साथ मित्रता चुनता हूं; चाहे मुझे कितने भी विशाल समुद्र पार करने पड़ें, बुद्धिमान व्यक्ति पिता के वंशज को पृथ्वी पर एक सेतु की तरह प्रतिष्ठित करता है।” वे बताते हैं कि जो इस मित्रता की इच्छा नहीं करता, जो रूप बदल लेता है, वह सच्चा मित्र नहीं है। ये महानता के पुत्र, असुरों के वीर, आकाश के धारक, विशाल विस्तार में प्रसिद्ध हैं। फिर अमर आत्माएं, एक नश्वर, प्रत्यक्ष मनुष्य की भी कामना करती हैं, पर वे कहते हैं—“तुम्हारा मन हम पर न लगे, हमारे शरीर को पाने की इच्छा न करो, हे युवा!” वे संकल्प करते हैं कि जो पहले किया, अब न करें; सत्य बोलें, असत्य को न अपनाएं। गंधर्व जल में है, और कन्या भी—वही हमारा सर्वोच्च बंधन और संबंध है। गर्भ में, उत्पत्ति का कारण पति-पत्नी का युग्म है; देवत्वष्टा, अनेक रूपों वाले सविता; उनके नियम कोई नहीं तोड़ता, पृथ्वी और आकाश दोनों उनके पात्र को जानते हैं। वे पूछते हैं—“आज कौन सत्य के जुए में गौओं को जोतता है, वे कौन बलवान, दीर्घायु हैं? वे हृदय में समीप थे, आनंद लाते थे—जो उनकी सेवा करता है, वही जीवित रहता है।” फिर वे गूढ़ प्रश्न उठाते हैं—“इस सृष्टि का पहला दिन कौन जानता है? किसने देखा है? यहाँ कौन बता सकता है? मित्र और वरुण का महान क्षेत्र—मनुष्यों की उत्पत्ति का मैं कैसे वर्णन करूं?” इसके बाद एक मार्मिक प्रसंग आता है—यम की बहन यमी, यम के साथ एक ही गर्भ में, एकता की कामना करती है, पति के लिए जैसे पत्नी लालायित होती है, वैसे ही वह मिलन चाहती है; पर यम इस इच्छा को तोड़ देते हैं, जैसे रास्ते में रथ का पहिया टूट जाए। वे कहते हैं, “ये यहाँ न खड़े होते हैं, न बैठते हैं; ये देवताओं के गुप्तचर हैं जो इधर-उधर चलते हैं। किसी अन्य के साथ जाओ, जो तुम्हें प्रसन्न करता हो, उससे अलग हो जाओ, जैसे रथ का पहिया मार्ग से अलग हो जाए।” रात्रि और दिन से वे आशीर्वाद की प्रार्थना करते हैं—“सूर्य की दृष्टि हमें बार-बार नापे; दिन-रात, पृथ्वी-आकाश संबंध में जुड़े हैं—यमी यम से अलग हो गई।” वे यमी से कहते हैं—“आगे बढ़ो, आने वाली पीढ़ियों में, जहाँ पत्नियां संतति उत्पन्न करती हैं; किसी बलवान का आलिंगन करो, जैसा चाहो, पति की खोज करो।” फिर वे भाई-बहन के संबंध की मर्यादा पर विचार करते हैं—“अगर भाई असहाय हो जाए तो क्या, बहन पर विपत्ति आए तो क्या? अगर मैंने इसमें कोई दोष किया है, तो मैं उसे सहूं; अपने शरीर की रक्षा अपने शरीर से करो।” यम कहते हैं—“मैं तुम्हारा रक्षक नहीं, न ही मैंने तुम्हारे साथ शरीर मिलाया है; किसी अन्य में सुख खोजो, अपने भाई में नहीं—वह इसकी इच्छा नहीं करता।” वे दृढ़ता से कहते हैं—“मैं भी तुम्हारे साथ शरीर नहीं मिलाऊंगा; जब बहन पास आती है तो लोग उसे दोष मानते हैं; यह विचार, यह भावना मेरी नहीं है कि भाई अपनी बहन के साथ लेटे।” यमी दुखी होकर कहती है—“हाय, यम, मैंने तुम्हारा मन या हृदय नहीं पाया; कोई और साथी तुम्हारे साथ जन्म से ही जुड़ा है, जैसे लता वृक्ष को जकड़ लेती है।” यम उत्तर देते हैं—“कोई और स्त्री, हे यमी, तुम्हारे साथ मिलन के समय तुम्हें आलिंगन करेगी, जैसे लता वृक्ष को लपेटती है। तुम्हारा मन उसी की ओर जाए, उसका मन तुम्हारी ओर; तुम दोनों के बीच सद्भावना स्थापित हो।” फिर ऋषि बताते हैं कि कवियों ने तीन छंदों की रचना की, अनेक रूपों और सर्वदर्शी को देखकर; जल, वायु, और वनस्पतियाँ—ये सभी एक ही लोक में स्थित हैं। बलवान वृषभ ने अपने परिश्रम से दिव्य जल दुग्ध कराया, वह अदिति का शक्तिशाली, अजेय पुत्र है। वरुण सब कुछ ज्ञान से जानता है, वह योग्य ऋतुओं की पूजा करता है। गंधर्वी और स्त्री, दोनों, नदी की ध्वनि से हमारे मन की रक्षा करें; इच्छितों के बीच अदिति हमें स्थापित करें; हमारा भाई, हमारा ज्येष्ठ, सबसे पहले बोलता है। वह तेजस्विनी, धन्य, महिमा से युक्त, मनु के लिए प्रकाश लेकर जागी है। जब जाग्रत लोग जाग्रत का अनुसरण करते हैं, तब वे अग्नि, पुरोहित, को यज्ञ के लिए उत्पन्न करते हैं। फिर वह तेजस्वी, ज्ञानी बूँद, शक्तिशाली गरुड़, यज्ञ में प्रकाशित होती है। जब श्रेष्ठ लोग अग्नि को पुरोहित के रूप में चुनते हैं, तब ज्ञान का जन्म होता है। इस प्रकार, यह कथा हमें विजय, धर्म, मर्यादा, संबंधों की सीमाओं, सत्य, मित्रता, और ज्ञान की ओर ले जाती है—जहाँ देवता, ऋषि और मनुष्य, सब एक दिव्य अनुशासन और स्नेह में बंधे हैं।