एक समय की बात है, जब एक साधक ने अपने जीवन की रक्षा और कल्याण के लिए देवताओं का आह्वान किया। उसने प्रार्थना की कि उसकी प्राणवायु—श्वास और निश्वास—मृत्यु में न गिरे, और स्वाहा उच्चारण के साथ उसने यह याचना की। वह आकाश और पृथ्वी से भी बोला, “हे स्वर्ग और पृथ्वी! मेरी पुकार सुनो और मुझे गिरने मत दो—स्वाहा।” फिर वह सूर्य से बोला, “हे सूर्य देव! अपनी दिव्य दृष्टि से मेरी रक्षा करो—स्वाहा।” उसने अग्नि वैश्वानर का आह्वान किया, “हे अग्नि! समस्त देवताओं के साथ मेरी रक्षा करो—स्वाहा।” और फिर उसने सबका आधार बनने वाले से कहा, “हे सर्वाधार! अपने सम्पूर्ण आधार से मेरी रक्षा करो—स्वाहा।” इसके बाद साधक ने उन शक्तियों का स्मरण किया, जिनसे जीवन चलता है। उसने प्रार्थना की, “तुम ही तेज हो, मुझे तेज दो—स्वाहा। तुम ही बल हो, मुझे बल दो—स्वाहा। तुम ही शक्ति हो, मुझे शक्ति दो—स्वाहा। तुम ही जीवन हो, मुझे जीवन दो—स्वाहा। तुम ही श्रवण शक्ति हो, मुझे श्रवण दो—स्वाहा। तुम ही दृष्टि हो, मुझे दृष्टि दो—स्वाहा। तुम ही रक्षा हो, मुझे रक्षा दो—स्वाहा।” अब साधक ने शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना की। उसने कहा, “तुम शत्रुओं का नाश करने वाले हो, मुझे शत्रुओं को दूर करने की शक्ति दो—स्वाहा। तुम प्रतिद्वंद्वियों का नाश करने वाले हो, मेरे लिए उन्हें दूर करो—स्वाहा। तुम असुरों का नाश करने वाले हो, मेरे लिए उन्हें दूर करो—स्वाहा। तुम दुराग्रही शत्रुओं का नाश करने वाले हो, मेरे लिए उन्हें दूर करो—स्वाहा।” फिर साधक ने अग्नि देव से प्रार्थना की, “हे अग्नि! अपनी ऊष्मा से उसे दग्ध करो जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं। अपनी पकड़ से उसे पकड़ो, अपनी ज्वाला से उसे झुलसा दो, अपनी लपट से उसे भस्म कर दो, और अपनी प्रभा से उसे निर्बल बना दो।” इसके पश्चात उसने वायु देव का आह्वान किया, “हे वायु! अपनी ऊष्मा से उसे जला दो जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं। अपनी पकड़ से उसे जकड़ो, अपनी ज्वाला से उसे झुलसा दो, अपनी लपट से उसे भस्म कर दो, और अपनी प्रभा से उसे निर्बल कर दो।” फिर सूर्य देव की ओर उसने प्रार्थना की, “हे सूर्य! अपनी ऊष्मा से उसे जला दो जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं। अपनी पकड़ से उसे पकड़ो, अपनी ज्वाला से उसे झुलसा दो, अपनी लपट से उसे भस्म कर दो, और अपनी तेज से उसके तेज को निर्बल कर दो।” इसके बाद वह चंद्रमा से बोला, “हे चंद्रमा! अपनी ऊष्मा से उसे तपाओ जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं। अपनी पकड़ से उसे पकड़ो, अपनी ज्वाला से उसे झुलसा दो, अपनी दाह से उसे जला दो, और अपनी प्रभा से उसके तेज को निर्बल कर दो।” अंत में उसने जल देवताओं का आह्वान किया, “हे जलों! अपनी ऊष्मा से उसे तपाओ जो हमसे द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं। अपनी पकड़ से उसे पकड़ो, अपनी ज्वाला से उसे झुलसा दो, अपनी दाह से उसे जला दो।” इस प्रकार, साधक ने सम्पूर्ण सृष्टि के तत्वों—आकाश, पृथ्वी, सूर्य, अग्नि, वायु, चंद्रमा, और जल—से अपनी रक्षा, शक्ति, जीवन और शत्रुनाश की प्रार्थना की, और स्वाहा के साथ सबको समर्पित किया।