एक समय की बात है, एक गाँव था जहाँ सभी प्राणी—गाय, घोड़े, मनुष्य और अन्य पशु—सुख-शांति से रहते थे। उस गाँव के लोग और पशु वनस्पतियों की शक्ति और कृपा पर गहरा विश्वास रखते थे। वे उन पौधों की स्तुति करते थे, जिनकी जड़, डाली, पत्ती, फूल—सब कुछ मधुर था। वे मानते थे कि ये पौधे अमृत से उत्पन्न हैं, जीवनदायिनी हैं, और गाय-बैल के लिए घी और पोषण प्रदान करते हैं। गाँव के लोग प्रार्थना करते कि पृथ्वी पर जितनी भी औषधियाँ हैं, वे सब उन्हें मृत्यु और संकट से मुक्त करें। वे विशेष रूप से उन हज़ार पत्तों वाली शक्तिशाली वनस्पतियों को याद करते, जो रोग और विपत्ति को दूर करती हैं, जैसे कि बाघ-पत्थर की तरह रक्षा करती हैं और सभी अभिशापों से बचाती हैं। वे मानते थे कि जैसे शेर की गर्जना या अग्नि की चटक आवाज़ सब कुछ तितर-बितर कर देती है, वैसे ही ये औषधियाँ मनुष्य और पशुओं के रोगों को दूर कर, बीमारी की धारा को नदी की ओर प्रवाहित कर दें। ये औषधियाँ उस अग्नि से मुक्त हुई थीं, जिसने सबको जीवन दिया, और वे धरती पर फैलकर, वन के स्वामी की छाया में, फलती-फूलती थीं। गाँववाले प्रार्थना करते कि पर्वतों और समतल भूमि पर उगने वाली अंगिरस औषधियाँ दूध से भरपूर हों, मंगलकारी हों और उनके हृदयों में कल्याण लाएँ। वे जानते और अनजानी, देखी-अनदेखी, सभी औषधियों को स्मरण करते, और उनसे निवेदन करते कि वे उनके वचनों को सुनें और संकटग्रस्त व्यक्ति को कष्ट से पार ले जाएँ। वे पीपल, कुश, अन्य वनस्पतियाँ, सोमराज, अमृत, चावल-यव, और स्वर्ग की संतान औषधियों का आह्वान करते, जो अमरत्व प्रदान करती हैं। वे प्रार्थना करते, “हे औषधियों, जब बादल, जो तुम्हारी रंग-बिरंगी माता हैं, अपने बीज बरसाएँ, तब तुम गर्जना और पुकार के साथ उठो।” वे अमरत्व के उस बल को किसी रोगी को देने की कामना करते, ताकि वह सौ शरद् तक जीवित रहे। वे मानते थे कि जंगली सूअर, नेवला, साँप, गंधर्व—जो औषधियों को जानते हैं—उनकी भी सहायता यहाँ बुलाते हैं। पक्षी, हंस, उड़ने वाले जीव, और वन के पशु—जो औषधियों का ज्ञान रखते हैं—उन सबको भी सहायता के लिए पुकारते हैं। जितनी औषधियाँ गायें और बकरियाँ चरती हैं, उतनी ही औषधियाँ एकत्र होकर रक्षा करें। जितनी औषधियों का ज्ञान मानव वैद्यों को है, उतनी ही सारी औषधियाँ वे अपने पास लाते हैं। फूलने, फलने, और दूध जैसी औषधियाँ—चाहे फलवती हों या न हों—माँ की तरह सबको हानि से मुक्त करें। वे कहते हैं—“हमने तुमसे पाँचगुनी, दसगुनी और यम के फंदे जैसी सारी बाधाएँ दूर कर दी हैं, साथ ही सभी दैवी अपराध भी।” इसी गाँव में एक समय शत्रुओं का संकट आ गया। तब गाँव के लोग इन्द्र, शक्तिशाली और वीर शक्र, का आह्वान करते हैं—“हे इन्द्र! जैसे हम अपने शत्रुओं की सेनाओं को नष्ट करते हैं, वैसे ही तुम भी उन्हें पराजित करो।” वे शत्रु सेना को अपवित्र करने के लिए, धुएँ से अग्नि को प्रकट कर, शत्रुओं के हृदय में भय भरने की प्रार्थना करते हैं। वे पीपल, खदिर, अर्जुन वृक्षों से कहते हैं—“उन्हें काट डालो, खा जाओ; वे कमज़ोर तिनकों की तरह टूट जाएँ, और मारने वाला उन्हें अस्त्र-शस्त्र से नष्ट कर दे।” वे प्रार्थना करते हैं कि कठोर नाम वाले वृक्ष शत्रुओं को कठोर बना दें, और वे एक विशाल जाल में बँधकर तीर की गति से टूट जाएँ। वे याद करते हैं कि इन्द्र ने आकाश, दिशाओं और पृथ्वी पर जाल फैलाकर दस्युओं की सेनाओं को नष्ट किया था। इन्द्र का यह जाल बहुत महान है, उससे सारे शत्रु वश में हो जाते हैं, कोई नहीं बच पाता। वे कहते हैं—“हे इन्द्र, तुम्हारा जाल महान है; इससे तुमने सैकड़ों, हज़ारों, दस हज़ार, लाखों दस्युओं को अपनी सेना के साथ पराजित किया।” अब यह सारा संसार शक्र के जाल से घिर गया है, और मैं भी इन्द्र के जाल से शत्रुओं को अंधकार में ढँक देता हूँ। वे बुखार, सूजन, क्लेश, थकावट, भ्रम—इन सब से शत्रुओं को घेर लेते हैं। वे उन्हें मृत्यु के फंदे में बाँधकर, यम के दूतों के हवाले कर देते हैं, जो विनाश के अधिकारी हैं। वे प्रार्थना करते हैं—“यम के दूत, मृत्यु के दूत, उन्हें ले जाएँ; हज़ारों-हज़ारों शत्रु मारे जाएँ, और वे घास की तरह नष्ट हो जाएँ।” साध्य, रुद्र, वसु, आदित्य—सभी देवता अपनी शक्तिशाली जाल-दंड लेकर शत्रु सेना को चारों ओर से घेर लेते हैं। सभी देवता ऊपर से जाल फैलाते हैं; अंगिरसगण सेना के बीच और पृथ्वी पर प्रहार करते हैं। वन के वृक्ष, वन्य प्राणी, औषधियाँ, घास, दोपाया-चौपाया—सब शत्रु सेना को नष्ट करने के लिए भेजे जाते हैं। गंधर्व, अप्सराएँ, नाग, देवता, पितर, देखे-अनदेखे—all प्राणी—शत्रु सेना को नष्ट करने के लिए बुलाए जाते हैं। वे मृत्यु के ऐसे फंदे हैं, जो पकड़े जाने पर कभी नहीं छोड़ते; यह हज़ार गुना जाल शत्रु सेना को विनष्ट कर दे। अग्नि से आहुति दी जाती है, यह यज्ञ हज़ार बार किया जाता है। भव्य, पृष्णिबाहु, और शर्व—ये सब शत्रु सेना को नष्ट करते हैं। वे शत्रुओं को मृत्यु, भूख, क्षय, संहार, और भय के गिर्द गिरा देते हैं। इन्द्र अपने दोनों वज्रों से, शर्व के साथ मिलकर, शत्रु सेना को मारते हैं। शत्रु भयभीत होकर भागते हैं, ब्रहस्पति के वचनों से भगाए जाते हैं, और कोई भी उन्हें छुड़ाने न पाए। उनके अस्त्र-शस्त्र गिर पड़ें, वे तीर चलाने में असमर्थ हो जाएँ; भय से कांपते हुए, उनके तीर उन्हीं के प्राणों को भेद दें। वे सब एक साथ चिल्लाएँ, स्वर्ग, पृथ्वी, मध्यलोक, देवता—सब उनके विरुद्ध हों। वे अपने संबंधी और स्थान को न पहचानें, उनके बीच विघ्न आएँ, और वे मृत्यु के समीप पहुँच जाएँ। चारों दिशाएँ रथ के घोड़े हैं, हवि रथ का अग्रभाग है, खुर मध्यलोक हैं, ऊर्ध्व दिशा जुआ है। आकाश-पृथ्वी पंख हैं, ऋतु लगाम हैं, दिशाएँ परिचारक हैं, और वाणी रथ का परिक्रमा-पथ है। इस प्रकार, गाँव के लोग, देवताओं, वनस्पतियों, और प्रकृति की सभी शक्तियों का आह्वान करते हुए, अपने और अपने समाज की रक्षा, आरोग्यता और विजय की प्रार्थना करते हैं।