ऋषियों के पावन आश्रम में एक दिन सभी लोग एकत्रित हुए। वे एक-दूसरे के प्रति समझ और सौहार्द की कामना करने लगे। उन्होंने प्रार्थना की—“हमारे बीच, हमारे अपने लोगों में, और हमारे मित्रों में आपसी समझ बनी रहे। हे अश्विनीकुमारों, हमारे बीच यह समृद्धि बनी रहे।” वे चाहते थे कि सबकी बुद्धि एक हो, सबके विचार एक हों, और किसी भी प्रकार का मनमुटाव या विघटन न हो। वेदना थी कि सभा में कभी ऊँची आवाज़ें न उठें, न ही इन्द्र के दिन कोई भ्रम या विवाद हो। फिर उन्होंने देवताओं से प्रार्थना की—“यदि किसी अन्य स्थान पर हम पर कोई श्राप लगा है, हे बृहस्पति, कृपया हमें उससे मुक्त करें। अश्विनीकुमार मृत्यु को हमसे दूर रखें, और हे अग्निदेव, देवताओं के वैद्य, अपनी शक्तियों से हमारी रक्षा करें।” वे सबको एक साथ जीवन के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं—“अपने शरीर को कभी मत छोड़ो, प्राण एक बने रहें, सौ वर्षों तक स्वस्थ और बलवान जियो। अग्नि तुम्हारे रक्षक हैं, और वशिष्ठ तुम्हारे स्वामी।” यदि किसी का प्राण दूर चला गया हो, तो वे उसे पुकारते हैं—“जो प्राण दूर चला गया, जो श्वास भीतर या बाहर गया, वह लौट आए। अग्निदेव तुम्हें निरृति के पाश से वापस लाएँ, और हम यह सब तुम्हें पुनः प्रदान करते हैं।” वे प्रार्थना करते हैं कि प्राण कभी दूर न जाए, जीवन की शक्ति बनी रहे, और सप्तर्षि उसे वृद्धावस्था तक सुरक्षित ले जाएँ। वे प्राण और जीवन को दो जुते हुए बैलों की तरह बहने देते हैं, ताकि शरीर दीर्घायु और निरोगी बना रहे। ऋषि रोग को दूर करते हैं, प्राण को वापस बुलाते हैं और अग्निदेव से प्रार्थना करते हैं कि वे जीवन को हर ओर स्थापित करें। वे अंधकार से ऊपर उठकर, दिव्य प्रकाश—सूर्य—तक पहुँचने की बात करते हैं, जहाँ वे देवों के देव, परम ज्योति को प्राप्त करते हैं। फिर वे यज्ञ में ऋचाएँ और सामगान अर्पित करते हैं, जिनसे सभी कर्म सिद्ध होते हैं। ये मंत्र सभा में प्रकाशमान होकर देवताओं के पास यज्ञ पहुँचाते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि देवता अपने आकाशीय मार्गों से उन्हें कल्याण की ओर ले जाएँ। कभी-कभी जीवन में विषैले जीवों का भय होता है। ऋषि कहते हैं—“लंबे जीवन वाले, काली चींटी, पृथ्वी की ढेरी और बिच्छू के जोड़ से जो विष है, उसे हम इकट्ठा करते हैं।” वे एक मधुर औषधि का वर्णन करते हैं, जो मधु से उत्पन्न है, और बिच्छू के विष का नाश करती है। जहाँ-जहाँ डंक या काटने का विष फैला है, वहाँ से उसे बुलाकर निकालते हैं। जो टेढ़े-मेढ़े, विकृत, हानि पहुँचाने वाले हैं, उन्हें वे वाणी के स्वामी से प्रार्थना करते हैं कि वे सीधा करें, जैसे सरकंडे सीधे किए जाते हैं। इस प्रकार वे बिच्छू के विष को दूर करते हैं, और पीड़ित व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। वे पूछते हैं, “तुम्हारे हाथ, सिर, या मध्य में कोई शक्ति नहीं, तो अपनी बुरी पूँछ से क्यों बच्चे को हानि पहुँचाते हो?” वे कहते हैं कि चींटियाँ काटती हैं, मोर तुम्हें नोचते हैं, और सभी जीव बोल उठते हैं—बिच्छू का विष निष्प्रभावी हो जाए। वे पूछते हैं, “तुम पूँछ और मुँह दोनों से डंक मारते हो, पर मुँह में विष नहीं, तो पूँछ में क्या है?” ऋषि अपने शरीर में जहाँ-जहाँ कोई विक्षोभ, थकावट या विखंडन अनुभव करते हैं, वहाँ सरस्वती से प्रार्थना करते हैं कि वह उसे घी से भर दें। वे सात पुत्रों की बात करते हैं, जो मरुतों के पिता के लिए बहते हैं, और सत्य को प्रकट करते हैं। फिर वे इन्द्र और वरुण को सोमरस अर्पित करते हैं—“हे इन्द्र-वरुण, यह मधुर, शक्तिशाली सोम पियें, और यज्ञ में अपने रथ से यहाँ पधारें।” वे प्रार्थना करते हैं कि दोनों देवता इस सोमरस को ग्रहण कर, कुश पर आसीन होकर प्रसन्न हों। कभी किसी के शाप या बुरी दृष्टि का भय हो, तो वे कहते हैं—“जो भी हमें शाप देता है या नहीं देता, किसी भी प्रकार से शाप देता है, वह जड़ से सूख जाए, जैसे बिजली से तना हुआ वृक्ष।” जब वे किसी के घर में प्रवेश करते हैं, तो शुभ बुद्धि, धन, और मित्रता के साथ आते हैं, और निवासियों से कहते हैं—“हमें देखकर हर्षित हो, डरो मत।” वे घरों की समृद्धि की कामना करते हैं—“ये घर आनंद से भरे हों, बल और समृद्धि से युक्त हों, और जब हम आएँ तो हमें जानें।” वे कहते हैं—“जहाँ यात्री निवास करता है, जहाँ सद्भावना है, उन घरों को हम पुकारते हैं।” वे मित्रों, पशुओं, और अन्न की प्रचुरता का आह्वान करते हैं, और घरों से कहते हैं—“भूख-प्यास से मुक्त रहो, डरो मत।” वे प्रार्थना करते हैं कि घर यहीं टिके रहें, बढ़ें-फलें, और वे स्वयं भी सौभाग्य के साथ आएँ। वे अग्नि से तपस्या की शक्ति माँगते हैं, ताकि ज्ञानी, दीर्घायु और प्रिय बने रहें। अग्नि को वे सच्चा स्वामी मानते हैं, जो पृथ्वी के नाभि में स्थित है, और बिना बादल के चमकता है। वे अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें सभी आपदाओं से पार लगाए। कभी-कभी कोई अशुभ पक्षी उड़ता या गिरता है, तो वे जल से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। यदि वह पक्षी रोता है, तो वे अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें दोष से मुक्त करें। अपामार्ग नामक वनस्पति से वे सभी बुराइयों, पापों और दोषों को दूर करते हैं। वे कहते हैं—“अपामार्ग, जो पीछे की ओर फल देता है, तू सब हानिकारक लोगों को यहाँ से हटा दे। जो भी पाप, अपवित्रता, या कोई बुरा कार्य हमने किया हो, अपामार्ग से सब दूर करते हैं।” यहाँ तक कि यदि कभी उन्होंने दुष्टों या अछूतों के साथ कुछ साझा किया हो, तो भी वे अपामार्ग से सब पाप धो डालते हैं। इस प्रकार, ऋषि, देवताओं और प्रकृति की शक्तियों का आह्वान कर, जीवन के हर पहलू—समझ, स्वास्थ्य, समृद्धि, और सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं, और सभी के लिए मंगल की कामना करते हैं।